Thursday, 18 October 2018

कितना भी चाहूँ, तुम्हे लिख नही पाता ।।

कितना भी  चाहूँ तुम्हे लिख नही पता
कहना चाहता हु बहुत कुछ कह नही पाता ।
कैसे कहूँ कौन हो तुम ??
मेरी जान हो , पहचान हो अरमान हो तुम।
जो खूद ही खूद को दिया ऐसा फरमान हो तुम
तुमसे ही तो ज़िन्दगी है मेरी,
तुममें ही बसा मेरा चैन है ।
तुम ही हो सब कुछ,
तुम में ही हरदम डूबा मेरा नैन है ।
याद आते हो तो कभी गम दे जाते हो,
कभी हंसाते हो,कभी आंसू सनम दे जाए हो ।
याद आतीं है तुम्हारी वो हर बात,
वो पहली छुअन वो पहली मुलाकात,
तुम थी बेबाक, मैं शर्माता लड़का था,
तुम इठलाती गुड़िया सी,मैं खुद में सहमा सहमा था ।
तुम घिरी रहती थी लोगों से, मैं तेरी यादों में डूबा करता था।
तुम्हे परवाह नही थी किसी की, मैं तेरी परवाह किया करता था ।
कभी तुमसा अपना तो था न कोई, अब तुमसा कोई बेगाना  नही ।
जा चुके हो तुम इतने दूर, सुनो अब वापस आना भी नही ।
जी लेंगे तुम्हारे बगैर गर तुम जी लो,
हाँ सच्च है, कभी ऐसा सोचने की हिम्मत भी कर नही पाता ।
और
कितना भी चाहूँ तुम्हे लिख नही पाता ।।

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