Wednesday, 17 August 2016

वो बदनसीब माँ ।।।

जिसने उसे जन्म दिया
जिसने उसे मर मर कर पाला पोसा
रात रात भर जगाने के बावजूद भी  जिसने
अपने लाडले को कभी ना कोसा ।
जिसने अपना लिया खुशी खुशी
लाडले से सृजीत परेशानियों को ये सोचकर,
एक दिन उभरेगा मेरा बेटा
हम अंधे की लाठी बनकर ।
जिसने अपने बेटे के पसंद के खिलौंने खरीदने के खातिर
न जाने कितने दिन भूखों सोया
पर बेटे के चेहरे की खुशी देख ,कभी ना रोया ।।
जिसे अपनी दवाइयों से ज्यादा जरूरी
बेटे की किताबें लगती थी
जिनकी पलके शाम होते ही
स्कूल से आने वाली पगडंडियों
पर ही झपकती थी ।
अपने बेटे को दुसरो की भांती सुख न दे पाने की कमी हमेशा उनके दिल में खलती थी
कैसे वह माँ अपने बेटे के जरा भी बीमार होने पर
दिन भर बगल में बैठ कर पंखे झलती थीं ।
कैसे उन्होंने बेच दिए थे अपने गहने
लाडले को कॉलेज में admission कराने को,
पूछने पर हंस कर बोला था-अरे पगले ।
तू कमाएगा तो दे दूंगी न फिर से बनाने को ।।
आज उस माँ के दोनों बेटे Doctor और Engineer हैं,
कोई नहीं आता पास भले ही ,
दोनों रहते near हैं ।
माँ के इलाज से ज्यादा जरूरी उन्हें,
दुसरी में पढ़ने वाली बेटी की लैपटॉप लगती है
आज भी उस अँधेरे कोने में पडी माँ की पलके शाम होते ही हाई-वे पर ही झपकती है ।
बेटे को बीबी बच्चे के महीने के कपडे पुराने लगने लगते है
माँ के लिए कब कपड़ा खरीदा ये याद नहीं,
माँ कहती है बेटा खुश है
मुझे कुछ भी न दे तो भी कोई बात नहीं ।
अब क्या बताऊँ मैं,उस देवी की बदनसीबी
उन्हें 15-15 दिन दोनों बेटों के घर खाना पड़ता है
लेकिन 31 दिन वाले माहिनो में
उस ममतामयी,करूणामयी और परमात्मा की बेहतरीन रचना माँ को,
भूखों सो जाना पड़ता है ।
(समर्पित-इस धरा की सबसे बेहतरीन और पूजनीय आत्मा ,मेरी माँ  को ।।।।)

No comments:

Post a Comment