आज मामा जी से बात करते हुए अचानक पुराने दिन याद आ गए । वो , वो दिन थे जब मामा जी पढ़ाई के लिए घर के बाहर रहते थे, मै घर में । और एक आज का दिन है जब मामा जी घर पर हैं और मै बाहर। आज जब भी मन होता है , बस कॉल लगाया और बात हो गयी । अब बात करना बहुत आसान हो गया है , चाहे कोई कितना भी दूर क्यूँ न हो । और यही कारण है की उतनी excitement भी नहीं रहती , साधारण सी चीज लगती है।
याद आ रहे हैं अब मुझे वो दिन । जब एक दूसरे से बात करना इतना आसान नहीं था । जब डाकिया चाचा हमारे घर के पास रुकते थे और उनके रुकते ही हम बच्चे पहुच जाते थे उनके पास।
"ई ल रंजन बाबू । मामा भेजले हथून "
कहते हुए वे हमारे हाथों मे एक लिफाफा पकड़ा देते थे । हम उस लिफ़ाफ़े को लेकर दौड़ते हुए घर में हाजिर होते और सब को खुशी खुशी पढ़कर सुनाते। हमारे चिटठी पढ़ते समय दादा और दादी ऐसे देखते जैसे उनका पोते का पढ़ाना सफल हो गया । और जैसे ही हम उस चिट्ठी के अंत मे पहुँचते और हमारा नाम "आप सब को प्रणाम और रंजन बाबू को ढेर सारा प्यार " के साथ आता, हम खुशी से उछल पड़ते थे। सच्च मे याद नहीं है कितनी बार हुमने उस आखिरी पंक्ती को पढ़ था ।
पहले चिठ्ठी को पहुचने में , बहुत दिन लग
जाते थे और उसके उतर वापस आने मे महीनों। और इस तरह शुरुआत होती थी एक लंबे इंतज़ार की । और सारी excitement तो बस इंतज़ार की ही थी । इंतज़ार एक लंबा इंतज़ार ।
हाँ, लेकिन एक बात है, दिल की भावनाओं को जितनी अच्छे से ये कुछ पंक्ती के लिफ़ाफ़े या पोस्टकार्ड्स अभिव्यक्त कर पाते थे, उतने ये घंटों के कॉल नहीं कर पते थे। चिठ्ठीयों से, इन पोस्ट कार्ड्स से बिना कहे भी दिल की भावनाएं अभिव्यक्त हो जाती थीं , बिना आवाज के भी हो जाती थी सब बातें और एक फोन है जिसमे आवाज होती है लेकिन वो भाव नहीं होता । वो प्यार नहीं मिल पाती । और हाँ, आप चिठ्ठी की तुलना ई - मेल से भी नहीं कर सकते । क्यूंकी ये तुलना, कल और आज की नहीं हैं, ये तुलना टेक्नॉलजी की नहीं है , ये तुलना भावनाओं की है, ये तुलना जज़्बातों की है और इसमे कभी चिठ्ठी कमजोर नहीं पड़ सकता चाहे दुनियाँ कहीं भी चली जाए ।
कभी नहीं।
शायद, कभी नहीं। ।


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