जब कभी चलते चलते रुक जाता हूँ मैं,
जब ज़िंदगी के इन चोटों से टूट जाता हूँ मैं ,
जब गिर जाता हूँ औंधे मुँहे और कोई आता नहीं संभालने
तेरे हाथों का स्पर्श महसूस कर,
खूद ही उठ जाता हूँ मै ।
तेरी परवाह से जूड़ी हर बात मुझे बहुत सताती है॥
माँ । मुझे तेरी बहुत याद आती है । ।
इस अनजाने से शहर मे,
ज़िंदगी के इस मुश्किल से सफर मे
जब कभी फंस जाता हूँ
इस ज़िंदगी के भंवर मे !!
जब दिखता नहीं कोई सहारा ,,
जब कोई साथ नहीं देता हमारा
जब कभी नहीं भाती मुझे ये होटलों के खाने,,
जब अब सुनने होते हैं अपने बॉस कके ताने !!
गलत न होने पर भी आपका वो चुप होना आज मुझे रुला जाती है,,
माँ !! मुझे आपकी बहुत याद आती है!!
सोचता हूँ माँ मै आज,
कैसे थोड़ी सी तबीयत खराब होने पर
सारा घर सर मै सिर पर उठा लिया करता था।
गलती खुद मे होने पर भी आप पर चिल्ला लिया करता था ।
नहीं जब पूरी होती थी मेरी मांगे
कैसे मै सारा समान फेक कर फैला दिया करता था ।
कैसे आप मुझे मनाती थी ,,
कैसे पापा के डांट से बचाती थीं ।
कैसे जब मै दुबक कर आपके गोद मे छिप जाता था ,,
और कैसे आप मुझे सुरक्षित महसूस करा ती थी।
ज़िंदगी के इस भाग दौड़ मे आपको अकेले छोड़ना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता ,,
पर क्या करूँ माँ ??
ज़िंदगी की जरूरते बहुत कुछ कराती हैं ।
माँ मुझे आपकी बहुत याद आती है !!
माँ , मुझे आपकी बहुत याद आती है !!


Hert touching poem sir, Amazing
ReplyDeleteThank you Champion
DeleteI will recite this poem to my mother. Best poem 👍
ReplyDelete❣️❣️❣️🩸👍❣️💯💯
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