Friday, 1 June 2018

निराश न हो failures ।।

मोबाइल, फेसबुक और अखबार उन बच्‍चों से भरे हैं, जिन्‍होंने दसवीं में शानदार प्रदर्शन किया. 10वीं की बात की जाए तो लगभग 1 लाख से ज्यादा बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने 90% से ज्यादा स्कोर किया है। 27000 के लगभग बच्चो नें 95% से ज्यादा स्कोर किया है पूरे देश में । सीन चौड़ा कर के घूम रहे है ऐसे बच्चे एवं उनके माता पिता.

लेकिन सच्च कहूँ तो मैं अपने आप को उस ओर खड़ा होने से नही रोक पाता जिस ओर ये बच्चे खड़ा हैं जिनसे लोग जिन्दी में ज्यादा एक्सपेक्ट नही करते ।आखिर एक failure को पता होता है कि अब कोई भी मार्कशीट, कोई भी कागज के बूते उसे ज़िन्दगी में कुछ नही मिलने वाला ।उसे ही करनी होगी मेहनत। उसे ही बढ़ानी होगी अपनी capabilities  । और दूसरी तरफ एक अच्छे परसेंटेज से पास हुआ विद्यार्थी को विशवास होता है अपने मार्कशीट पर, उस कागज पर ।आखिर कैसे मान लूँ मैं की वो बच्चा जिसे आज ये समझ आ गया है कि, उसका मार्कशीट नही उसके qualities ही बनाएंगे उसे सक्सेसफुल, जिंदगी के रेस में पीछे पड़ जाएगा उस बच्चे से जिसे एक कागज के टुकड़े पर यकीन है। सफल बच्‍चा उस बच्‍चे से कैसे बेहतर हो सकता है, जो तय समय में रटी/समझी चीजें ठीक से नहीं लिख पाया. यह समझ पाना बहुत मुश्किल है कि कैसे एक कम नंबर पाने वाले बच्‍चे को उस बच्‍चे से कमतर कहा जा सकता है, जिसके नंबर उस बच्‍चे से अधिक आए हैं. बात केवल भारत की नहीं है, दुनिया के तमाम बड़े देश इस बात की गवाही देते हैं कि वहां के इतिहास, विज्ञान, शोध, राजनीति, कला, सिनेमा में जितना योगदान कम नंबर लाने वालों का है, उतना दूसरे किसी का नहीं है. और ऐसा तो हुआ नही आज तक कि कम प्रतिशत वाले बच्चे ज़िन्दगी में अच्छी मुकाम हासिल न कर पाए हो । और ये so called toppers कोई बहुत बड़ी तीर मार गए हो । हाँ, लेकिन मेहनती होना जरूरी है। और average लोग ज्यादा मेहनती होते हैं, ऐसा मैंने देखा है ।।

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