Friday, 5 August 2016

यादों के झरोखो से ।

बारिश हो रही है आज । बाहर गिरती एक एक बूंदों को देख रहा हूँ मै ।बारिश तो वही है लेकिन शायद अब वक़्त बदल गया है। बुँदे तो वही है लेकिन शायद मै बदल गया हूँ ।
बाहर गिरती एक एक बुँदे मुझे एक एक करके मेरे बचपन में ले जा रही है। ऐसी ही तो होती थी बरसाते उस वक़्त भी। ऐसे ही गरजते थे बादल ।ऐसे ही तो खिलता था सारा आलम ।ऐसे ही चहकती थी चिड़ियाँ। और हम चिड़ियों के चहकते ही "आंधी पानी आव ला  चिरैया ढोल बजावला" जैसे गाने गाते हुए गोल गोल घूमते थे । ये सिलसिला तब तक चलता था जब तक हम पूरी तरह से भींग न जाएँ या मम्मी हमें जबरदस्ती वहां से लर न जाएं। घर पहुच जाने के बाद भी कहाँ थमती थीं हमारी शैतानियाँ।
जैसे ही मम्मी के हाथों के पकड़ ढीले हुए हम झट से भागकर ओरी(घर को वो भाग जहा से बारिश का पानी गिरता है) के नीचे पहुच जाते थे और मज्जे में नहाते थे। किसी का कुछ घर से बाहर का काम कहना की बस हमारा दौड़ लगा देना। नंग धड़ंग होकर उस समय जो मज्जा खेतों की आरियों से होकर एक बार अपने खेतो का चक्कर लगा कर आने में मिलता था वो आज नसीब कहाँ?? आज भी खलती है उन सारी चीजों की कमी।
इन सभी चीजों से थक कर जब हम घर में प्रविष्ठ होते तो हमारा स्वागत गरमा गरम भुट्टों से होता  । आज भी याद आता है कैसे हम अपने छोटे भाई बहनो का अच्छा वाला भुट्टा हड़प लिया करते थे। कैसे अपने घर में काम करने वाले बाबा  के कंधो पर बैठकर सारे खेत घूम आते थे ।और कैसे जब सरे लोग धान रोपने में व्यस्त होते थे तो हम ऊधम मचाया करते थे।
याद आते है वो सब मंज़र । घूम जाते है एक एक करके इन आँखों के आगे ।और जब भी ऐसा होता है आँखे बंद कर लेता हूँ, घूम  आता हु उस दुनियां में जो अब कल्पना मात्र में ही है। चाहता तो हूँ कि काश एक बार फिर से वो जिंदगी मिल जाए लेकिन जानता हूँ कि सपने बार बार नहीं आते।हालाँकि वो सच था लेकिन सपने से कम तो नहीं था न ।
वैसे तुलना तो नहीं किया जा सकता किसी दो दौर का । और मै करना भी नहीं चाहता लेकिन अगर मुझे चुनना हो जिंदगी के किसी एक दौर को तो मै एक सेकंड भी देर किये बिना भी उस बचपन के दौर को चुनूंगा।
भले ही वो सपना बन कर रह गया है लेकिन इस हक़ीक़त से बेहतर है।
बेहतर।
बहुत ही बेहतर।।

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