Friday, 25 November 2016

परीक्षा ।।


कल 7th semester का last exam था ।  वापस आते वक़्त दो चीज़े चल रही थी मन में । एक ओर तो थोड़ी उदासी थी की बस अब  engineering की एक ही semester  बाकी है ।वही दूसरी ओर खुसी हो रही थी इग्ज़ैम खतम हो जाने की । ऐसा लग रहा था जैसे कोई बोझ हल्का हो गया हो ।
आते वक़्त मैंने कुछ वैसा देखा जिसने मुझे , ये एहसास करा  दिया की मेरी इस परीक्षा को परीक्षा नहीं कहा जा सकता । असली परीक्षा तो कुछ और लोग  दे रहे हैं । ।
college से room आते वक़्त एक गाँव पड़ता है। तालाब है वहाँ एक । मैंने देखा की कोई दस साल का लड़का अपने छोटे से भाई को नहला रहा था । बगल मे ही उसकी एक मैली सी झोली राखी थी । समझते देर नहीं लगी की  बच्चे अनाथ हैं । वो दस साल का लड़का अपने झोले से कुछ निकलता और फिर अपने उस  भाई को नहलाने लग जाता। वो झोला नहीं घर  था उसका । उतनी ही तो होती है कई लोगों के पास और उतने से  ही गुजार लेते हैं अपनी ज़िंदगी । और कुछ होते है जिनके पास करोड़ों होजाए ,पेट ही नहीं भारत उनका ।
 नहलाते वक़्त उसका छोटा भाई भी नहीं रो रहा, जैसे  की छोटे बच्चे अमूमन रोते हैं । समझता होगा सायद वो नादान भी अपने बड़े भाई का दर्द। पता चलता होगा उसे भी की नखड़े  दिखने का हक़ भगवान ने उसे दिया ही नहीं है ।  या फिर अपने भगवान रूपी भाई को परेशान नहीं करना चाहता होगा । 
रुक गया मैं वही थोड़े देर के लिए . उसके नहलाने के बाद उसके बड़े भाई ने अपने झोले से कुछफटे   कपड़े  कपड़े निकाल कर उसके शरीर  पोंछें और फिर एक बड़े कुशल माँ की तरह कपड़े पहनाकर खुश हो गया  ।परिस्थितियाँ कभी कभी बच्चों को  समय से पहले ही बड़ा बना देती है । परिस्थितियों का एक ऐसा ही करतब का गवाह बन रहा था मैं उस दिन .
फिर वो बच्चा वह से उठा , अपने भाई को उठाया और चल दिया । मुझे उसकी हर चाल मे एक विजेता का चाल दिख रहा था । 
उसके जाने के बाद घर आते वक़्त मैं सोचता रहा आखिर कैसे खिलता पिलाता होगा ये नन्हा सा जान अपने भाई को । किसी दिन कर को खटखटाते  खटखटाते थक जाता होगा और इसे  जब कुछ नहीं मिलता होगा तो कैसे सुलाता होगा रात में अपने भाई को ।लोरियाँ  भी तो नहीं आती होंगी  न इसे  । आखिर कैसे आएंगी ?? माँ की लोरियों का नसीब सबको  कहा होता है ??
मैं सोचता रहा की जब कभी यह बच्चा अपनी पीठ पर लादकर अपने भाई को काही ले जाता होगा और किसी से कुछ खाने को माँगता होगा , और खाने के बदले मे उसे चल भाग जा या गालियां सुनने को मिलती होंगी तो अपने छोटे से भाई को एक बड़े भाई के तौर  पर क्या समझता होगा?? जब कभी वो दस साल का बच्चा  बीमार होता होगा और उसका भाई भूख से बिलखता होगा तो कैसे वह उसे हालात में उसके लिए खाने  की खोज मे दर दर भटकता होगा ??

कहाँ एक छोटा   स बच्चा अपने भाई के लिए माँ और बाप दोनों की भूमिके निभा रहा था औरकैसे  हम अपनभूमिका निभाने में भी कमजोर पड़  जाते हैं । उसके द्वारा दी जाने वाली रोज की ज़िंदगी की परीक्षा के सामने मेरे परीक्षा बौनी लग रही थी । हमारी परीक्षा तो परीक्षा है ही नहीं । ।
परीक्षा तो उनकी है । ।
असली । ।
ज़िंदगी की परीक्षा । ।

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